SSB के पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट ने थामा खेती का रास्ता, 5 हेक्टेयर में उगा रहे 3,000 से अधिक चंदन के पेड़

Former SSB Assistant Commandant Utkarsh Pandey cultivating more than 3,000 sandalwood trees across 5 hectares in Pratapgarh, Uttar Pradesh, promoting organic farming and rural entrepreneurship.

Former SSB Assistant Commandant Utkarsh Pandey cultivating more than 3,000 sandalwood trees across 5 hectares in Pratapgarh, Uttar Pradesh, promoting organic farming and rural entrepreneurship.

SSB के पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट उत्कर्ष पांडेय की चंदन खेती, 5 हेक्टेयर में 3000+ पेड़

प्रतापगढ़ के उत्कर्ष पांडेय ने सुरक्षा सेवा से कृषि उद्यमिता तक तय किया सफर, जैविक खेती और मल्टी-क्रॉपिंग से किसानों को दे रहे नई दिशा

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। सरकारी सेवा में राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने के बाद गांव की मिट्टी से जुड़कर कृषि को व्यवसाय और रोजगार का माध्यम बनाने की कहानी आज युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। सशस्त्र सीमा बल (SSB) के पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट उत्कर्ष पांडेय ने अपने पैतृक गांव भदौना, प्रतापगढ़ में आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है।

दूरदर्शन के ‘कृषि दर्शन’ कार्यक्रम में प्रदर्शित उत्कर्ष पांडेय की कहानी बताती है कि वैज्ञानिक सोच, तकनीकी जानकारी और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ खेती को भी एक लाभकारी उद्यम में बदला जा सकता है।

नौकरी से कृषि उद्यमिता तक का सफर

उत्कर्ष पांडेय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में सेवा देने के बाद अपने गांव लौटकर कृषि को अपना नया मिशन बनाया। उनके प्रयासों का उद्देश्य केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को मजबूत करना भी है।

उनका मानना है कि यदि गांवों में कृषि को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और बाजार से जोड़ा जाए तो ग्रामीण युवाओं को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने की आवश्यकता कम हो सकती है।

करीब 5 हेक्टेयर में 3,000 से अधिक चंदन के पेड़

उत्कर्ष पांडेय की कृषि पहल का सबसे खास हिस्सा चंदन की खेती है। उन्होंने शुरुआती स्तर पर कुछ सौ पौधों से प्रयोग शुरू किया और अब लगभग 5 हेक्टेयर क्षेत्र में 3,000 से अधिक चंदन के पेड़ विकसित किए हैं।

चंदन की खेती को लेकर आम धारणा है कि इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण भारत में होती है। उत्कर्ष पांडेय ने वैज्ञानिक प्रशिक्षण और प्रबंधन के माध्यम से उत्तर प्रदेश में भी इसके व्यावसायिक अवसर तलाशने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने Institute of Wood Science and Technology (IWST), Bengaluru से वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।

चंदन के साथ हल्दी और अन्य फसलों की इंटरक्रॉपिंग

चंदन एक दीर्घकालिक निवेश वाली फसल है। इसके तैयार होने में समय लगता है। ऐसे में किसानों की नियमित आय सुनिश्चित करने के लिए उत्कर्ष पांडेय मल्टी-क्रॉपिंग मॉडल पर काम कर रहे हैं।

चंदन के साथ कम अवधि वाली और अपेक्षाकृत अधिक मूल्य वाली फसलों की खेती की जा रही है। इनमें हल्दी, दालें और सब्जियां प्रमुख हैं। विशेष रूप से दुर्लभ किस्मों की हल्दी, जैसे काली हल्दी और मेघालय हल्दी, को भी इस मॉडल में शामिल किया गया है।

इस तरह एक ही भूमि से दीर्घकालिक और अल्पकालिक दोनों प्रकार की आय का अवसर तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

‘रिशि ग्राम ऑर्गेनिक्स’ के जरिए खेती से बाजार तक

उत्कर्ष पांडेय की पहल ‘रिशि ग्राम ऑर्गेनिक्स’ केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसके अंतर्गत कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

इस मॉडल का उद्देश्य किसानों को केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय वैल्यू एडिशन और बेहतर बाजार मूल्य से जोड़ना है।

जैविक और प्राकृतिक खेती पर जोर

उत्कर्ष पांडेय प्राकृतिक एवं जैविक कृषि पद्धतियों को भी बढ़ावा दे रहे हैं। कार्यक्रम में उन्होंने जीवामृत जैसे प्राकृतिक कृषि इनपुट के उपयोग तथा रासायनिक कीटनाशकों से दूरी बनाए रखने पर जोर दिया।

‘रिशि ग्राम ऑर्गेनिक्स’ के माध्यम से घी, हर्बल पाउडर और आंवला आधारित उत्पादों सहित विभिन्न कृषि एवं प्राकृतिक उत्पादों की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग पर भी काम किया जा रहा है।

ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का मॉडल

उत्कर्ष पांडेय की पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण युवाओं को कृषि से जोड़ना है। उनका विजन है कि गांवों में खेती को तकनीक आधारित, लाभकारी और उद्यमशील व्यवसाय बनाया जाए, ताकि रोजगार की तलाश में युवाओं का शहरों की ओर पलायन कम हो।

उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि कृषि केवल पारंपरिक आजीविका नहीं, बल्कि आधुनिक कृषि उद्यमिता का मजबूत आधार भी बन सकती है।

SSB से खेत तक—एक प्रेरक कहानी

एक ओर जहां उत्कर्ष पांडेय ने सशस्त्र सीमा बल में असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई, वहीं दूसरी ओर अब वे अपने गांव में कृषि के माध्यम से आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास की दिशा में काम कर रहे हैं।

उनकी कहानी ‘सरकारी सेवा से गांव की सेवा’ की एक अलग तस्वीर पेश करती है—जहां वर्दी के बाद खेत उनका कार्यक्षेत्र बना और वैज्ञानिक कृषि उनका माध्यम।

JawanTimes.com की नजर में यह कहानी उन युवाओं के लिए खास संदेश है जो कृषि को पारंपरिक पेशे के बजाय एक आधुनिक करियर और उद्यम के रूप में देखना चाहते हैं।

🔹 रिपोर्ट: जवान टाइम्स

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जवान टाइम्स

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